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इंसान दे चुके हैं पृथ्वी के वायुमंडल को ग्लोबल वार्मिंग वाला 25 अरब परमाणु बमों का तोहफा

18वीं सदी में इंसानों ने औद्योगिक क्रांति के बाद से करीब 2 ट्रिलियन मेट्रिक टन की कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है और यह सब जीवाश्म ईंधन के बेतहाशा इस्तेमाल से हुआ है। इससे यह हुआ है कि पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में हमारी पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है।

इससे पृथ्वी के प्राकृतिक कार्बन चक्र में से ऊर्जा जाने और निकलने की प्रक्रिया में असंतुलन पैदा हो रहा है, जिसकी वजह मानवीय गतिविधियां हैं। नए अध्ययन में दर्शाया गया है की हम इंसानों ने 25 अरब परमाणु बमों जितनी ऊर्जा पिछले 50 सालों में पृथ्वी के तंत्र में डाल कर असंतुलन पैदा कर दिया है।

यानि 1.2 डिग्री औसत तापमान बढ़ाने वाली ऊष्मा पैदा केवल अरबों परमाणु बमों ने की है। देखने में तो यह एक छोटी सी मात्रा लग रही है, परन्तु इसके नतीजे बहुत ही ज़्यादा ख़तरनाक होते जा रहे हैं। इसके नतीजे हैं अनियंत्रित अप्रत्याशित और प्रचंड प्राकृतिक आपदाएं, चरम मौसमी घटनाएं, ग्लोबल वार्मिंग, पीने के पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में तेज़ी से कमी आदि। यह जानकारी एक इशारा कर रही है कि हम कैसे पृथ्वी के ऊर्जा प्रबंधन प्रक्रियाओं में एक बहुत बड़े कारक बनते जा रहे हैं।

वायुमंडल का काम है ऊर्जा अवशोषण करना। सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है शुक्र जिसका औसतन तापमान 464 डिग्री सेल्सियस है। वहां का वायुमंडल पृथ्वी से ज़्यादा घना, मोटा और कार्बन डाइऑक्साइड से भरपूर है। शुक्र पर कभी महासागर रहे होंगे लेकिन ग्रीनहाउस के प्रभाव से बहुत ही ज़्यादा ऊष्मा जमा होने के कारण वहां के हालत नर्क की तरह बन गए। आशंका है कि पृथ्वी की हालत में सुधार नहीं लाया गया या उसका यही हाल रहा तो वह भी शुक्र की तरह हो जाएगी।

अभी तक हम पहले ही कार्बन डाइऑक्साइड आधे से ज़्यादा बढ़ा चुके हैं और ग्रीनहाउस गैसें इतनी सक्षम होती हैं की थोड़ी मात्रा में बहुत ही ज़्यादा और बड़ा असर दिखाती हैं। इसमें मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड भी शामिल हैं। नए अध्ययन से पता चला है कि 380 जीटाजूल (यानि 380 हज़ार अरब अरब जूल) की अतिरिक्त ऊर्जा 1971 से 2020 के बीच वायुमंडल में जमा हुई है। ये कुल उत्सर्जन का 60 फीसद है। वहीं हिरोशिमा में गिराया गया परमाणु बम 15 हज़ार अरब जूल की ऊर्जा का था। यानि देखा जाए तो अब तक हम 25 अरब परमाणु बमों की ऊर्जा वायुमंडल को दे चुके हैं।

तो सवाल पैदा होता है कि इतनी सारी ऊर्जा अभी कहां है और गई कहां। अभी तक अतिरिक्त ऊर्जा का 90 फीसद महासागरों में जाता है जो उनके शीर्ष एक किलोमीटर के दायरे में हैं। यही वजह है कि हमारे महासागर तेज़ी से गर्म होते जा रहे हैं। इसका एक समाधान है वायुमंडल में से ज़्यादा कार्बन निकालना और दूसरा कार्बन उत्सर्जन में कटौती करना। इन दोनों समाधानों को उपयोग में लाना होगा जिसके बाद ही धीरे-धीरे हालात सामान्य हो सकेंगे।

आशीष ठाकुर – हिमाचल प्रदेश