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क्या है बड़े स्टेशनों की पटरियों पर नुकीले पत्थर न होने की वजह

ट्रेन से सफर करते समय आपने पटरियों पर नुकीले पत्थर तो जरूर देखे होंगे। इन नुकीले पत्थरों को बैलेस्ट कहा जाता है। यह पत्थर आपको पूरे रास्ते देखने को मिलेंगे। जबकि छोटे स्टेशनों पर भी आपको यह पत्थर देखने को मिल जाएंगे। लेकिन दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े-बड़े स्टेशनों पर आपको यह पत्थर देखने को नहीं मिलेंगे। क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों है, अगर आप नहीं जानते तो हम आपको बताते हैं। ऐसा करने के पीछे का कारण बहुत ही मजेदार है। उससे पहले इन पत्थरों का क्या कार्य होता है, उसके बारे में हम जान लेते हैं।

पटरियां दो चीजों पर टिकी होती है, एक बैलेस्ट और दूसरा स्लीपर। स्लीपर पहले लकड़ी के बने होते थे, लेकिन अब काफी समय से इन्हें सीमेंट का बनाया जाने लगा है। पटरी के ठीक नीचे जो पिलरनुमा ढांचे आपको दिखते हैं वह स्लीपर होते हैं। दो स्लीपर्स के बीच में बैलेस्ट को डाला जाता है।

इन बैलेस्ट का इस्तेमाल इसलिए होता है, ताकि बारिश में या फिर समय बीतने के साथ पटरी के नीचे की जमीन न खिसके। बैलेस्ट का काम होता है मिट्टी को जकड़ कर रखना। इतना ही नहीं ट्रेन के चलने से पैदा होने वाले कंपन को भी यह अवशोषित करते हैं। इसके अलावा यह ट्रैक पर खरपतवार को उगने से रोकते हैं। कुल मिलाकर यह ट्रेन को बड़ी दुर्घटना से बचाने का काम करते हैं।

बड़े स्टेशनों पर क्यों नहीं होते बैलेस्ट?

यह पत्थर आपको बड़े स्टेशनों पर नजर नहीं आते लेकिन छोटे स्टेशनों पर नजर आ जाएंगे। ऐसा क्यों है, इसकी सबसे बड़ी वजह है साफ-सफाई। ट्रेनों के कोच पहले आईसीएफ यानी (इंटिग्रल कोच फैक्ट्री) मैं बनाए जाते थे और डिब्बों में खुले निर्वहन शौचालय होते थे। यानी कि यात्री का मल-मूत्र सीधा पटरी पर गिरता था। अभी भी कई ट्रेनों में यही शौचालय हैं। अब जाहिर सी बात है कि बड़े स्टेशनों पर गाड़ी लंबे समय तक रूकती है।

ऐसे में ट्रेन में बैठे कई लोग शौचालय जाएंगे, जिससे सारी गंदगी पटरियों पर ही गिरेगी। अब अगर स्लीपर की जगह वह नुकीले पत्थर होंगे, तो बाद में उन्हें साफ करना काफी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए बड़े स्टेशनों पर पटरियों को कंक्रीट की ढलाई पर बनाया जाता है। इससे यह होता है कि पटरियां सुरक्षित भी रहती हैं और पटरियों को बड़े पाइपों से पानी मारकर साफ करने में भी काफी आसानी होती है।

छोटे स्टेशन पर क्यों होते हैं बैलेस्ट?

छोटे स्टेशनों पर गाड़ियां बहुत ज्यादा समय के लिए नहीं रुकती हैं, इसलिए वहां गंदगी होने की आशंका भी काफी कम होती है। यात्री भी उन स्टेशनों पर शौचालय जाने से परहेज करते हैं, जहां ठहराव काफी कम समय के लिए हो। इसलिए रेलवे छोटे स्टेशनों पर बैलेस्ट ही लगे रहने देता है। एक और बड़ा कारण यह है कि बैलेस्ट वाली पटरियों का रखरखाव काफी अधिक करना पड़ता है। अगर बड़े स्टेशनों पर लगातार परियों का रखरखाव होता रहेगा तो वहां पर ट्रेनों को लाने-ले जाने में समस्या पैदा होगी।

आशीष ठाकुर – हिमाचल प्रदेश