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मैं देश का आम आदमी…जिंदगी भर लाइनों में खड़ा रहा, अब मरने के बाद भी कतार में हूं

मैं देश का आम आदमी हूं….
आपने मुझे पैदा होने से पहले भी देखा होगा जब मेरी मां लाइन में खड़ी थी मतदान के लिए । मैं जब पैदा हो गया था तो इस दुनिया में आम और खास क्या होता तब ये मेरी समझ से परे था । हालांकि जब स्कूल में एडमिशन के लिए घंटों मम्मी पापा के साथ कतार में खड़ा रहना पड़ा तब ये तो समझ आ गया था की हम खास नहीं हैं । फिर थोड़ा बड़ा हुआ तो कॉलेज में एडमिशन के लिए भी लंबी लाइन थी….लेकिन जब उस लाइन को काट कुछ लोग आगे जाते हुए दिखे तब समझ आया हम आम हैं । अभी तो जीवन की शुरुआत होनी ही थी की जॉब इंटरव्यू के लिए इंतजार करना पड़ा हमसे पहले बहुत लोगों का नंबर था । लेकिन हुआ कुछ यूं की हमसे बाद वालों का नंबर हमसे पहले आगया और बस फिर क्या था वेकेंसी फुल । उस दिन आम और खास में अंतर समझ आ गया था । ये अंतर समझ ही रहे थे नोट बंदी आ गई बैंको के बाहर लोगों की कतारें और उनके मायूस चेहरे दिखे । बड़ी मुश्किल से उबरे थे उस सदमे से की ऐसी बीमारी आई जिसने समझ को भी फेल कर दिया और फेल हो रहे सिस्टम को एक्सपोज । लेकिन अब जो लाइन लगी तो आंखे फटी रह गई इस आम और खास के खेल में । अस्पतालों के बाहर तो जिंदगी के लिए लाइन थी ही लेकिन शमशानों के बाहर चिता जलाने के लिए भी लाइन है। और यहां भी जिनका नंबर बाद में है उन्हे पहले भेज दिया जाता है । सब कह रहे हैं की इस बीमारी से ना आम बचा है ना खास। सच्चाई तो बहुत है सबकी बातों में लेकिन फर्क ये है की लाइनों में खड़ा होता है सिर्फ आम आदमी । नजर घुमाओ और देखो अपने आस पास की कतारों को ये हैं देश का आम आदमी । जिसकी बेबसी है हवा के लिए लाइन में खड़े होना …पानी के लिए लाइन में खड़े होना…जिंदगी बचाने के लिए लाइन लगाना….और मरने पर मरघट पर मौत की नींद सोने के लिए भी लाइन में इंतजार करना । खैर हद्द तो तब हो जाती है आम होने की जब इस आम जनता की किसी को नहीं पड़ी…देश में जानलेवा वायरस का कहर जिंदिगियों को निगल रहा हो तब भी देश के आम आदमी की जान इतनी सस्ती है की फिर खड़ा कर दिया गया लंबी लंबी लाइनों में की आओ और वोट करो । वोट करो क्योंकि आम आदमी वोट करेगा तभी तो कुर्सी पर बैठा खास बनेगा और फिर लगाएगा लाइन फरियादियों कि आओ आम आदमी तुम्हारी हम सुने….खैर वहां भी कमबख्त हमसे बाद के नंबर वाला पहले पहुंच जाएगा। ये है देश के आम आदमी की कहानी।

-मेघना सचदेवा