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मैं दिल्ली हूं, दर्द वालो की दिल्ली, महामारी से जूझती हुई दिल्ली

Apr 25, 2021 ,

दिल्ली…देश की राजधानी दिल्ली
दिल्ली…दिलवालों की दिल्ली
लेकिन आज दिल्ली दर्द वालों की दिल्ली है !
ये वो दिल्ली है जो राजनीति का भी केंद्र है और केंद्र का भी केंद्र । इस दिल्ली ने देखा है देश को बदलने का दावा और देश के हित के दावों का खोखलापन । दिल्ली हमेशा अपने जायकेदार पकवानों और अंग्रेजों के ज़माने से बनी इमारतों के लिए जानी जाती रही। लेकिन अब यही दिल्ली corona का केंद्र बनती जा रही है । उन हजारों लोगों की आंखों में वो आस किसी अपने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की… ना मिलने पर अपनों को खोने के बाद उन्ही आंखों से बेबसी के आंसू निकलने की…दिल्ली हर तस्वीर को समेट कर रखेगी । दिल्ली में ऑक्सीजन की किल्लत से पूरा देश वाकिफ है हालात सब बयां करते है की दावों में कितनी सचाई थी … सर गंगाराम हस्पताल में 22 से ज्यादा मरीजों की जान चली गई क्योंकि वो केंद्र और राज्य की ऑक्सीजन पॉलिटिक्स के बीच फंस गए । ये कहानी कोई एक अस्पताल की नहीं है , राजधानी के हर दूसरे अस्पताल में मरीजों की जान पर बन आई है । सरकारी अस्पतालों में कहा जाता है की मरीज़ कहां गया पता ही नहीं जमीन खा गई या आसमान निगल गया…. और प्राइवेट अस्पतालों ने मरीजों को भर्ती करने से ही हाथ जोड़ लिए हैं । देश की राजधानी का सीएम रो रहा है ….आखिर ये आंसू पूरी दुनिया की सहानभूति बटोरने के थे या केंद्र से गुहार के ? चलिए सहानभूति तो मिल गई लेकिन अब जो मर रहें हैं उनका क्या ? सीएम साहब आपने भी तो जनता से बड़े बड़े वादे किए थे तो क्या आपने पैंडेमिक से कुछ भी नहीं सीखा ? आप तो पढ़े लिखे हैं तो क्या आने वाले वक्त को लेकर एक्सपर्ट्स ने आपको नहीं चेताया ? कहां गए आपके मोहल्ला क्लिनिक या फिर वो भी सिर्फ सफाई के नाम पर जैसे घर में अलमारी में कपड़े ठूस दिए जाते हैं वैसा ही कुछ है ? खैर आप अब जवाब कहां देंगे आप तो अपना पल्ला झाड़ चुके हैं । केंद्र की राजनीति और आपका उसपर तमाम सोशल मीडिया और टीवी माध्यम से पलटवार यही देख रही है पिछले कुछ दिनों से दिल्ली । सिर्फ इतना ही नहीं शमशानो में, कब्रिस्तानों में जगह नहीं है चिताओं को जलाने की । दिलवालों की दिल्ली जल रही है …. हां बस आप में हिम्मत है की आप इन चिताओं को दिखा रहे हैं बुझाने के लिए पानी नहीं डाल रहे लेकिन ऐसी हिम्मत आपको सिर्फ कमज़ोर ही साबित करती है क्योंकि आपकी दिल्ली मर रही है !

-मेघना सचदेवा